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कस्बा कैराना शरीफ ( लेख मुन्शी मुनक्क़ा)

लेख कः मुन्शी मुनक्क़ा, शायर,फिल्मी गायक एवं कामेडियन
उर्दू कविता संग्रह ‘‘कड़वे बादाम’’ का एक लेख काट छाँट के पश्चात
हिन्दी रूपांतर: उमर कैरानवी

कस्बा कैराना शरीफ

न छेड़ ए हमनशीं प्रदेस में भूला सा अफसाना
मुझे पहरों रूलाता है मेरा घर मेरा कैराना
यह एक तारीखी कस्बा है। जिसकी तकरीबन पचास हज़ार की आबादी है। पानीपत की लडाई का जो मैदान मशहूर है। वह पानीपत और कस्बे की दरमियाना ज़मीन है। यहाँ के मशाहीर में से वज़ीर जहाँगीर नवाब मसऊद रह. उस्मानी उर्फ मुक़र्रबुल खाक़ान कैरानवी जो हज़रत मखदूम शैख जलालुद्दीन कबीरुल औलिया कलन्दर पानीपती रह. की औलाद में हैं। मज़ार मुबारक आपका पानीपत शरीफ हज़रत बू अलीशाह कलन्दर रह. के अहाते ही में बहुत शानदार बना हुआ है। कलन्दर साहब रह. का मज़ार मुबारक और उसमें कसौटी के सतून नवाब साहब ने ही बनवाये हैं कि यह कसौटी के सतून पहले नवाब साहब की बारादरी वाके कैराना ही में थे। नीज़ तख़्त ताऊस भी आपही का था जो जहाँँगीर ने तोहफतन खुद तलब कर लिया था। बाद में नादिरशाह दुर्रानी ईरान ले गया जो आज तक वहीं महफूज़ है। पिछले दिनों शहंशाह ईरान की ताजपोशी की रस्म इसी तख़्त पर अदा की गई।
दूसरे हज़रत मौलाना रहमतुल्लाह साहब उस्मानी मुहाजिर मक़क़ा जो इलम तकवा में लासानी थे और मदरसा सौलतिया मक्क़ा मुकर्रमा भी आपने क़ायम करके जिनकी ज़बान उनको अरबी पढाई। आज भी आपके पडपोते शेख मुहम्मद सलीम बहेसियत निगराॅ वहीं मुक़ीम हैं जो कि शाह की नज़रों में महबूब और मुअज़्ज़म हैं।
दरगाह शाह गरीबुल्लाह जिन्होंने औरंगजे़ब की मौजूदगी में कांटो पर कव्वाली सुनी थी कैराना में थे।
दूसरे बुजुर्गों के अलावा कैराना में एक ही ज़माने में तीन मुहम्मद इब्राहीम हुए हैं। तीनों बडे बुजुर्ग थे। पीरजी मुहम्मद इब्राहीम साहब उस्मानी की वजह से कैराना ‘‘कैराना शरीफ’’ मशहूर हुआ। आपकी दरगाह पर उर्स में पाकिस्तान और दूसरे मुल्कों से मेहमान आते हैं।
पीरजी इज़हार उस्मानी उर्फ आशिक़ कैरानवी पाकिस्तान के मशहूर शायर हैं।
दूसरे फनून के माहीरीन में सैयद इनायत हुसैन साहब जो हैदराबाद रियासत में तैराकी के मुकाबले में अन्तर राष्ट्रीय इनाम के मालिक थे। उनके बारे मशहूर है कि दरिया में तैरते हुए नाई से दाढ़ी बनवा लेते थे। निजाम की हकूमत के ज़माने तक आपके पोतों को पाँच सौ रूपये वज़ीफा हर महीने मिलता रहा।
पहलवान इरशाद अहमद ने 10 साल पहले 35 मिन्ट अकेले शेर से कुश्ती लडकर उसे मार डाला।
सैयद काले साहब को मुँह से तबला बजाने में इतनी महारत थी कि हाथ से तबला बजाने वाले हैरान थे।
गीतकारों का तो यहाँ अन्तर राष्ट्रीय शोहरत का मामला है। कैराना घराना मशहूर है यहाँ की राग रागनियाँ सबसे अलग और अच्छी मानी गईं। कैराना का नाम सुनकर बडे बडे गीतकार एअहतराम से कान पर हाथ रखते हैं, दुन्या-ए-संगीत ने आज तक इन सपूतों का जवाब पैदा नहीं किया।
बन्दे अली खाँ बीनकार जो वली सिफत इन्सान थे। बारा साल कलियर शरीफ में चिल्ला किया। आज भी जो बीनाकार दुनिया में मशहूर है उन्हीं का पोता और शागिर्द है।
अब्दुल करीम खाँ साहब जिनके रिकार्ड आज तक लोगों ने बेशकीमत समझकर रखे हुये हैं। अपनी यूरोप की यात्रा में मैंने 55रिकार्ड देखे और सुने। खाँ साहब ने पूना में कुछ शागिर्दों से मायूस होकर कह दिया कि कुत्ते गा सकते हैं मगर आपमें यह क्षमता नहीं है। फिर अब्दुल करीम खाँ ने दो कुत्तों को राग सिखा दिये जो बाकायदा प्रोग्राम पेश करते थे। एच. एम. वी. कम्पनी के ग्रामोफोन रिकार्ड पर जो कुत्ते को राग सुनते हुए दिखाया गया वह अब्दुल करीम खाँ के एज़ाज़ में ही है। भारत सरकार ने आल इण्डिया रेडियो देहली में विशेष रूप से बडी मूर्ती बनवाकर प्रवेश द्वार के करीब लगा रखी है।
बहरे वहीद खाँ आज भी राग रागनियों के वल्र्ड चेम्पियन अमीर अहमद खाँँ साहब साकिने लोहारी आप ही के शागिर्द हैं।
मौजूदा ज़माने में अब्दुश शकूर खान सारंगी नवाज़ को पिछले दिनों सरकार ने अपनी तरफ से रूस भेजा था।
उस्ताज फैयाज़ खाँ- मुम्बई, उस्ताद समद खाँँ साहब और शरीफ खाँ साहब लाखों में एक हैं भाई निज़ामुद्दीन, भाई इस्माईल, भाई नज़ीर बे बदल कव्वाल हैं।
हकीम तो यहाँ इतने अच्छे और अधिक हुये कि कस्बे का दूसरा नाम ही हकीमों वाला है।
नोटः जैसा है वैसा ही पढने के लिय उर्दू में कैराना वेबासाइट पर पढें।

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