चाँदनी महल (परियों का आस्‍ताना, डेरा) बेमिसाल ईदगाह देवी मन्दिर कैराना कैराना का नवाब तालाब कैराना के इतिहास पर ऐतिहासिक भाषण


नौ लखा बाग़ और बाग़बाँ

उमर कैरानवी

कस्बा कैराना की ईदगाह की कहानी बडों से सुनते रहे हैं कि कैसे एक रात में मजिस्ट्रेट को बाग़ तैयार दिखाया था। यह उस समय के बागबानी के कार्य करने वालों का कारनामा था। बागबानों के कैराना में आबाद होने के बारे में मेरे अब्बाजी हाजी शमसुल इस्लाम मज़ाहिरी सीना ब सीना कहानी (लोक कथा) सुनाते हैं जो उन्होंने अपनी जीवनी में विस्तार से लिखी है कि ‘‘जब नवाब मुकर्रब खाँ वज़ीरे जहाँगीर बादशाह ने नौलखा बाग़ लगाने का संकल्प किया था तब उन्हीं दिनों एक राजस्थानी राजपूत फरार हत्यारा नवाब साहब की शरण में आया। बातचीत से पता चला कि वह बागबानी में माहिर था। नवाब साहब उन दिनों महल और तालाब के निर्माण के साथ नौलखा बाग़(नो लाख वृक्षों का उद्यान) का संकल्प (मन्सूबा) किये हुये थे। इस शर्त पर उसको क्षमादान करवायी कि वह उनके नौलखा बाग के संकल्प (मन्सूबे) को पूरा करवायेगा।’’ इस बाग में बादशाह जहाँगीर आये और अपनी पुस्तक ‘‘तुजके जहाँगीरी’’ में इसके विवरण में लिखते हैं कि इस बाग में मैंने पिस्ता और सरू के ऐसे पेड देखे, इन जैसे कहीं नहीं होते। यह सब बाग़बानों का ही तो कमाल था। यह पुस्तक खुदा बख़्श लायब्रेरी-पटना की वेबसाइट पर उर्दू में उपलब्ध है।
तालाब के आसपास जो सैंकडों दूधी पत्थर के कुएं हैं यह उसी बाग की जल व्यवस्था के लिये बनाये गये थे। ऐसे पत्थर के कुएं हिन्दुस्तान में कही नहीं। उस्ताद महमूद खाँ स़फी कैरानवी, अपनी मन्ज़ूम उर्दू पुस्तक ‘‘कैराना शरीफ़’’ में जो वेबसाइट कैराना डाट नेट पर उपलब्ध है। यूँ लिखते हैं
लगाया था नौलखा एक बाग़ भी
लगे आम व अमरूद सेब व बही।
दरख्त इसमें लाखों किस्म के लगे
सभी सब्ज़ व शादाब फूले फले।
कहें हिन्द में पिस्ता फलती नहीं
मगर बागे बंगला में फूली फली।
140बिगह का बाग़ जिसके बीच में तालाब था बहुत बडा होने के कारण इस बागबाँ ने अपने रिश्तेदारों को भी यहाँ बुला लिया। जो यहीं बस गये और आज भी खेत खलिहान एवं बागों के काम कर रहे हैं। आगे चलकर यह लोग माली कहलाये जिन्होंने वक्त पडने पर तलवार भी उठाई। इस बारे में ‘‘कैराना शरीफ़’’ में शायरी में विवरण यूँ हैं
जो थे बाग़बानी को यहाँ बाग़बाँ
उन्हीं की है औलाद माली यहाँ
ग़दर में गुलामी से आ आ के तंग
लडे अहल कैराना की ख़ूब जंग
उ.प्र. में कैराना, लखनऊ, मंगलौर, सहारनपुर नजीबाबाद, बहराईच आदि में फैली हुई इस बिरादरी ने जो अलग-अलग नामों से जानी जाती थी, कुछ समय पूर्व बडों छोटों के मशवरे से इस बात की घोषणा कर दी कि हम माली, बाग़बाँ और गुलफरोश बिरादरी ने अपनी एक पहचान बाग़बाँ कर ली है, जिसे सभी ने अपना लिया है। बुजुर्गों का अनुमान है कि इस समय कैराना की आबादी में लगभग दस हज़ार बाग़बाँ हैं।
1910-50 ई. में नबिया पहलवान (बागबाँ) का नाम पश्चिमी उ.प्र. और हरियाणा में बहुत मशहूर हुआ। मौलवी फैज़ुल्लाह साहब के रूहानी असर से इस पहलवान ने बहुत नाम कमाया। मौलवी साहब भी नबिया पहलवान की कुश्ती देखने आते थे। बुजुर्गाें का कहना है कि उस समय हज़रत थानवी के मुरीद जो कि कुश्ती देखने को अच्छा नहीं समझते थे वह भी चुपके-चुपके नबिया पहलवान की कुश्तियाॅ देखनेे आते थे। छडियों के दंगल से पहले इस पहलवान को बिरादरी वालेे एक रूपया हर घर से देते थे जबकि एक रूपये का एक सेर घी आता था।
उस समय नबिया पहलवान, भंगड-गूजर एवं इन्ना-तेली का डंका था। जब तक यह तिकडी रही कोई कैराना से जीत कर ना जासका। भंगड-गूजर बारे में कहा जाता है कि यह बगैर खूंटे से बंधी भेंस की एक हाथ की शक्ति से टांग जकडकर दूसरे से दूघ पीता था।
इसी समय में हाफिज बुन्दू (बागबाँ) रूहानी विद्वान थे। इनका मज़ार मौहल्ला अफगानान-घौसा चैकी के पास है जहाॅ अकीदतमंद (श्रद्धालु) काफी संख्या में हाज़री देते हैं। थोडी दूरी पर मुगल काल में बनी मस्जिद है जिसे अब हाफिज बून्दू वाली मस्जिद कहा जाता है। कैराना में आपके कई शिष्य रूहानी लाभ पहुॅचा रहे हैं।
कुछ समय पूर्व अनीस पहलवान (बागबाँ) मरहूम जो कैराना में बहुत से ईनाम जीत कर लाये को1995 ई. में तत्कालीन मुख्यमंत्राी श्री मुलायम सिंह यादव ने 25000 रूपये तथा प्रमाणपत्रा दिया था।
वर्तमान में अब्बाजी जिन्हें मदर्सा सौलतिया-मक्का में क़्याम ;निवासद्ध के दौरान मक्का की एक बडी संस्था द्वारा बतौर अरबी-फारसी उस्ताद बनाने की पेशकश की गई, जो आपने नामन्ज़्ाूर की, क्योंकि मक्का में जो विवशता के कारण कुछ समय के लिए दफ़न किया जाता है वह आपको पसन्द नहीं। भतीजा जिया उल इस्लाम जो कैराना में राष्ट्रपति एवार्ड लाया जिसके पिताजी दिल्ली में स्काउट एंड गाईड के स्टेट कमिशनर हैं एवं मुझ से बडे भाई नजमुल इस्लाम जो उप-प्रधान मंत्राी चैधरी देवी लाल के दो बार सहायक रह चुके हैं इसी बिरादरी से हैं जो कल कैराना को नौलखा बाग़ से सजाने के लिये यहाॅ बसे थे आज यह सेवक इन्टरनेट( www.kairana.net & urdustan.net/kairana ) की दुनिया में इसे सजा रहा है।
17.01.2007

0 comments:

Post a Comment

My Facebook