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संगीत की दुनिया में ‘‘कैराना घराना’’

उमर कैरानवी

‘कैराना घराना’ जिसने संगीत की दुनिया विशेष रूप से शास्त्राीय संगीत में कैराना का नाम रौशन किया, वह किराना घराना के नाम से अधिक मशहूर है। जिसका आज भी संगीत में योगदान है। युरोप, अमेरिका, चीन आदि की यात्रा करने वाले कैराना घराना के संस्थापक अब्दुल करीम खाँ राग गाने में विश्व विख्यात रहे हैं, उनके गीतों के एच0 एम0 वी0 ने अनेक ग्रामोफोन रिकार्ड बनवाये जोकि बहुत हिट हुए।
एक समय ऐसा था कि भारत में दो संगीतकार थे जिनमें से एक अब्दुल करीम खाॅ थे और रिकार्डर कम्पनी अकेली एच0 एम0 वी0 थी, कम्पनी के ग्रामोफोन रिकार्डर पर अंकित कुत्ते के चिन्ह के बारे में कहा जाता है कि अब्दुल करीम खाँ जब बम्बई गये तो अपने साथ वह अपना कुत्ता भी ले गये जो संगीत ध्यान से सुनता था यही बात एच0 एम0 वी0 को पसन्द आयी और इस कुत्ते के चित्रा को रिकार्डर लोगो के रूप में दे दिया गया। बहुत से ग्रामोफोन रिकार्डरों को आज भी कैरानावासी काज़ी अनीस अहमद के पास देख सकते हैं। इस बारे में मुन्शी मुनक्क़ा जो फिल्मी दुनिया से तालुक रखते थे व उन्होंने अब्दुल करीम खाँ का समय देखा है ने अपनी पुस्तक ‘‘कडवे बादाम’ में लिखा है कि एक बार अब्दुल करीम खाँ पूना में संगीत की शिक्षा दे रहे थे तब किसी विघार्थी से खिन्न होकर उन्होंने ने कहा कि तुम संगीत की शिक्षा नहीं पा सकते कुत्ता पा सकता हैा। तब उन्होंने इस बात को सच कर दिखाया दो कुत्तों को राग सिखाय जो प्रोग्राम पेश करते थे। एच0एम0 वी0 ने कुत्ते के चिन्ह उन्हीं की सम्मान में दिये हैं।
कैराना घराना के सम्मान का अनुमान एक कथन से यूँ होता है कि अपने समय के महान संगीतकार मन्नाडै का किसी कारण कैराना आना हुआ तो कैराना की सीमा प्रारम्भ होने से पहले ही जूते उतार कर हाथों में ले लिए कारण जानने पर बताया कि यह धरती महान संगीतकारों की है इस धरती पर में जूतों के साथ नहीं चल सकता। कैराना वासियों ने मन्नाडै को सम्मान का उत्तर सम्मान से देते हुऐ उनकी याद में छडियान मैदान के स्टेज को जिस पर उन्होंने अपना प्रोग्राम प्रस्तुत किया था, मन्नाडै स्टेज का नाम दे दिया जो आज भी प्रचलित है।
अब्दुल करीम खाँ को आल इंडिया रेडियो ने इस तरह सम्मान दिया कि अपने मुख्य प्रवेश द्वार पर उनकी बहुत बडी प्रतिमा स्थापित की हुई है।
यहाँ कैराना घराना की संगीत साधना मुगल काल से हुई थी। उस समय कैराना के रहने वाले उस्ताद शकूर अली खां द्वारा यह संगीत कला शुरू की गई थी। किराना घराना आज भारत में ही नहीं बल्कि देश विदेश में भी प्रसिð है कुछ वर्ष पूर्व किराना घराने की सशस्वी कलाकार श्रीमति गंगुबाई हंगल को शास्त्राीय गायन, नव भारत टाईम्स ग्रुप द्वारा स्वर्गीय प्रधान मंत्राी इन्दिरा गांधी की पुण्य तिथि पर अपने उत्सव में आयोजित किया गया था। 20वीं सदी से पहले कैराना घराने का संगीत देश विदेश में प्रसिð रहा। यशवी कलाकार गंगूबाई हंगल जो कि हुब्ली-बंगाल में रहती हैं से आशिर्वाद लेना आज के संगीतकार अपना सौभाग्य समझते हैं। कैराना घराना के पंडित भीमसेन जोशी जो कि आजकल सुनामी पिडितों की सहायता में लगे हुए हैं की भी चारों ओ से सराहना हो रही है।
बाद में यह घराना कर्णाटक और बंगाल में बस गया। इस घराना में ठुमरी गायन का विशेष महत्व है। आज भी गायिका मुनीर खातून बेगम ठुमरी में अपने धराने की परंपरा के अनुरूप हर स्वर पर ठहराव से अपनी गायकी का लोहा मनवा रही है।
कैराना घराना के बारे में मेगजीनों, पुस्तकों और इन्टरनेट वेबसाईटों में बहुत जानकारी हैं
ग्रामोफोन पर बना कुत्ता, अब्दुल करीम खाँ, मुनीर खातून बेगम के चित्रा व अधिक जानकारी के लिए कहीं भी कैराना वेबसाईट कैराना डोट नेट देखें।

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